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प्रोपर्टी में बस अब इन लोगों को भी मिलेगा हिस्सा, Supreme Court ने सुनाया अपना फैसला

Supreme Court property law: प्रोपर्टी में बंटवारे को लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि अमानय् शादी से पैदा होने वाले बच्चों का भी संपत्ति में बराबर का हिस्सा होता है। उन्हे पिता की स्वंय अर्जित संपत्ति और पैतृक संपत्ति में भी हक का दावा करने का अधिकार है। 
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प्रोपर्टी में बस अब इन लोगों को भी मिलेगा हिस्सा, Supreme Court ने सुनाया अपना फैसला 

Newz Fast, New Delhi: ये फैसला चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में 3 सद्स्यों की बेंच ने एक मामले की सुनवाई के दौरान दिया है। ये फैसला हिंदू मिताक्षर कानून के तहत ज्वाइंट हिंदू फैमिली की संपत्तियों पर ही लागू होगा।

क्या था ये मामला-

दरअसल ये मामला 2011 के एक फैसले में दिए गए फैसले के खिलाफ दायर याचिका से जुड़ा है।  2011 के इस फैसले में भी अमान्य विवाह से होने वाले बच्चों को प्रॉपर्टी भले ही वो खुद अर्जित हो या फिर पैतृक हो हिस्सा मिलेगा। 

इस फैसले में कहा गया था कि ऐसे रिश्ते में बच्चे के जन्म को मामले से अलग देखना चाहिए। अमान्य शादियों में होने वाले बच्चों को वो सभी अधिकार मिलने चाहिए जो मान्य शादियों से होने वाले बच्चों को हासिल होते हैं। 

इस मामले में बहस पहले ही पूरी हो चुकी थी और सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। क्या होता है विवाह-भारत में विवाह एक धार्मिक प्रक्रिया है जिसके साथ कानूनी अधिकार भी जोड़े गए हैं। भारत में धार्मिक विविधता के कारण शादी के लिए कई कानून हैं। इसमें हिंदू मैरिज एक्ट, क्रिश्चियन मैरिज एक्ट, मुस्लिम पर्सनल लॉ, और स्पेशल मैरिज एक्ट आदि। 

इन सभी कानूनों का उद्देश्य है कि एक शादी को समाज में स्वीकृति मिले और पत्नी से लेकर बच्चों तक को उनके अधिकार मिलें। इन सभी कानूनों में इस बात के भी नियम हैं कि किन दो के बीच शादी संभव है और किन परिस्थितियों में शादी से बाहर निकला जा सकता है।

कानून के अनुसार कितनी तरह के होते हैं विवाह-विवाह 3 तरह के होते हैं पहला वैध विवाह या मान्य विवाह होता है जो नियमों के अनुसार होता है इसे कानूनी दर्जा हासिल होता है और शादी में बंधने वाले और आगे उनके बच्चों को अपने आप सभी अधिकार हासिल हो जाते हैं।

दूसरा विवाह होता है अमान्य (Void) विवाह। दरअसल नियमों के तहत कुछ मामलों में विवाह संभव ही नहीं है। जैसे हिंदू मैरिज लॉ में एक शादी के रहते दूसरी शादी संभव नही है। लेकिन अगर शादी होती है तो इस शादी को अमान्य विवाह कहा जाता है। हिंदू कानून के हिसाब से अमान्य विवाह में पुरुष और महिला को पति पत्नी का दर्जा नहीं मिलता। 

यही वजह है कि ऐसी शादी को खत्म करने के लिए किसी कानूनी आदेश की जरूरत नहीं होती। साथ ही पत्नी कोई दावा भी नहीं कर सकती। तीसरा विवाह होता है अमान्यकरणी (Voidable) विवाह यहां दोनों पक्षों में एक पक्ष विवाह को अमान्य करने की मांग करता है। 

और कानूनी आदेश के आधार पर विवाह को अमान्य घोषित करता है। ये तलाक से अलग होता है। जहां पर दो लोग शादी के बंधन को तोड़ने की मांग करते हैं। हालांकि अमान्यकरणी विवाह में शादी को ही रद्द करने की माग की जाती है 

और पक्ष अविवाहित माने जाते हैं, हालांकि तलाक के बाद दोनों पक्ष तलाकशुदा माने जाते हैं।  शुक्रवार के फैसले में अमान्य और अमान्यकरणीय विवाह के मामलों को लेकर ही फैसला दिया गया है।